क्या हो तुम?

तुम दरिया हो क्या …….
बता दो,
मैं कश्ती बन जाउंगी
डूबकर तुझमें मोक्ष में पाऊँगी।

तुम सूरज तो नहीं………
बता दो,
मैं सवेरा बन जाउंगी
तुझसे ही शुरू होकर खत्म तुझमें हो जाउंगी

तुम समंदर हो ना…..
बता दो,
मैं किनारा बन जाउंगी
रोज़ तेरा स्पर्श पाकर पवित्र में हो जाउंगी

तुम सफ़र तो नहीं……
बता दो,
मैं मंजिल बन जाउंगी
तेरा अंत भी और मकसद भी कहलाउंगी

तुम चाँद हो क्या……

बता दो,
मैं सूरज बन जाउंगी
फैलाकर रौशनी चहुँ ओर
सारे जग से तुम्हें छुपाउंगी

तुम फूल तो नहीं……

बता दो
मैं वसंत बन जाउंगी
जब जब होगा जिक्र तुम्हारा
याद मैं भी तो आउंगी

तुम बादल हो ना……

बता दो
मैं पानी बन जाउंगी
समाकर तुम में मैं कहीं
अपनी एक नई पहचान बनाउंगी

तुम रंग तो नहीं……

बता दो
मैं इंद्रधनुष बन जाउंगी
तुमसे ही पुकारी जाउंगी
तुमसे ही पहचान पाऊँगी

सुनो, तुम खुदा हो ना……

बता दो
मैं दुआ बन जाउंगी
कुबूल तुमसे ही होकर
मुकम्मल तुमसे हो पाऊँगी।

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Flowers

Flowers are the most beautiful gift given by nature. When I see any flower from the eyes of my heart I feel like I am in heaven, a place where everything is so beautiful, so divine. I am in love with flowers, their colour texture smell everything is just perfect, directly made by God.

शोर

अजीब सा एक शोर हैं फैला चहुँ ओर
मन के अंदर भी शोर और बाहर भी शोर घनघोर
आवाज एक जुबां से बाहर आने को है मचलती
पर न जाने क्यों है सहमी सी किस बात से है डरती
ये जो पहने बैठें हैं अमलीजामा नापाक सोच का
जाने क्यों कब से इन्हीं विचारों में हैं पलते
कोई इलाज तो होगा इस मोच का
क्यों ये खुद को खुदा सरीखा हैं समझते?
यूँ ही गुम न हो जाए आवाज मेरी इस शोर में
इस डर से में खुद से बातें किया करती हूँ
कहाँ है वो मंजिल कहाँ चल दी किस ओर मैं
अब कदम आगे बढ़ाने से नहीं रुक जाने से डरती हूँ
एक जलती लौ जिसे बुझाने को हैं हज़ारों तूफान राह में
कौन समझाए इन्हें फ़र्क़ है बड़ा इनकी सोच और मेरी चाह में
मुकम्मल जहां हर किसी को मिलता नहीं एहसास है मुझे
पर एक छोटी सी ख्वाहिश रखना गुनाह तो नहीं
इस शोर से परे अंतर्मन की आवाज पर विश्वास है मुझे
और विश्वाश की नींव पर महल बनाना गुनाह तो नहीं
इस शोर में भी अपनी आवाज की पहचान तलाश करती हूँ मैं
पर न जाने क्यों खो जाने से डरती हूँ मैं।

In love with Cooking

Cooking is art, food is just necessity…actually it’s true it’s an art , which gives you quick result of your work…& the satisfaction is in another level when someone says ” delicious food”.I think we all should cook at least once in a week because it reduces the stress…cooking is my stress buster & nothing is better than a well cooked delicious healthy food….

so I made “Stuffed Karela” …

तू और मैं

तू उगते चमकते सूर्य सा
मैं संध्या एक ढलती हुई
तू उस चाँद सा जो उज्जवल है
मैं ओस की बूंद, फिसलती हुई

तू अठखेली करती लहरों सा
मैं शांत समंदर के जल सी
तू तेज हवा के झौंके सा
मैं ठण्डी बयार सरल सी

तू हंसती खेलती ज़िन्दगी सा
मैं एक उदास मन लिए विह्वल सी
तू प्रसन्न चित्त उन्माद लिए
मैं नीरस ,निस्तेज, निर्मल सी

तू प्रेम गजल के राग सा
मैं उदासी भरे एक गीत सी
तू सितार की तानों सा मधुर
मैं बिछड़ते जोड़े की प्रीत सी

तू हरी भरी आच्छादित धरा
मैं निर्जन एकांत पठार सी
तू नीला स्वच्छ विस्तृत आकाश
मैं एक नन्हे से संसार सी

तू बेख़ौफ़ उड़ती एक तितली सा
मैं पिंजरे में पलते एक नभचर सी
तू फूलों की कलियों सा कोमल
मैं काँटों से भरी डगर सी……….

पृथ्वी ने पुकारा

जीवन दायनी कहते जिसे हम
दर्जा तो माँ का दिया उसे हमने
पर क्या सोचा कभी कितना है उसे गम
हर पल झंकझोरा है जिसे सबने
ये ही है हमारा जीने का सहारा
इसके बिन कुछ भी नहीं जीवन हमारा
जरा गौर से सुनो, उस पृथ्वी ने है पुकार

स्थिर है वो, कुछ नहीं कहती हमसे
पर डरती है ये भी इस प्रदुषण रुपी तम् से
जीवन दिलाया जिसने हमने उसी को है रुलाया
उस पर ही हमने वार किया हर फर्ज को है भुलाया
क्यों हमने इसकी सहनशीलता को है ललकारा
जरा गौर से सुनो, उस पृथ्वी ने है पुकारा

काटे हमने वृक्ष सारे, काट दी ये डालियाँ
अब बस धुंआ ही धुंआ है कहाँ गयी वो हरियालियाँ
इस पृथ्वी ने हमें कितना कुछ दिया
पर हमने बस इसका शोषण ही किया
फिर भी इसने निःस्वार्थ बन हमारा जीवन है सवांरा
पर एक दिन ढँक लेगा हमें ये घनघोर अँधियारा
जरा गौर से सुनो, उस पृथ्वी ने है पुकारा

कवि का प्रेम

एक कवि का इजहार-ऐ-इश्क़ जग से जुदा होता है
शब्दों में लिपटा हुआ कविता में बयां होता है

विचारों की गंगा जब उसके मन में प्रवाहित होती है
प्रेम की लहरें तब उसमें हिलोरे लेती हैं
उस प्रेम नदिया में डूब तब वो गोते लगाता है
फिर नाव रूपी इश्क़ उसका किनारे पर ले आता है

नयनों का मिलना अलंकारों से बयां होता है
उस “अपने” की मुस्कान के लिए हर छंद नया होता है
कल्पना शक्ति भी तब बस उसका जिक्र करती है
प्रकृति के हर रूप में बस उसकी छवि निखरती है

हर पंक्ति में कवि अपना समर्पण भाव दिखाता है
और उसकी प्यारी मूरत को विचारों से बनाता है
फिर शब्द रूपी रंगों से कलाकारी वो दिखाता है
और पूरी कविता को नाम उसके कर जाता है

कवि का निश्छल प्रेम कुछ तो खास होता है
उसकी कविता में हरदम “वो” उसके पास होता है
कवि की कविता भक्ति और “उसका” दर्जा खुदा का होता है
एक कवि का इजहार-ऐ-इश्क़ जग से जुदा होता है